जब तक मन को रस नहीं मिलता, तब तक वह भटकता रहता है। मन को स्थिर करने के लिए वीडियो में दो विधियों की बात कही गई है—धीमी श्वास और नाद।
इनमें श्वास की साधना बहुत सरल है।
बैठने से पहले कुछ समय खाली बैठकर अपनी श्वास को बहुत धीरे-धीरे लेना है। वीडियो में कहा गया है कि कोशिश ऐसी हो कि एक मिनट में लगभग तीन या चार श्वास ही चलें।
क्योंकि जब हमारी श्वास उथली होती है, तब मन भी बहुत सक्रिय हो जाता है। इसके विपरीत जब श्वास बहुत स्थिर और धीमी होने लगती है, तो मन भी शांत होने लगता है।
इसलिए मन को शांत करने के लिए श्वास एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकती है।
श्वास को महसूस करना
वीडियो में श्वास को केवल अपनी शारीरिक प्रक्रिया मानने के बजाय उसे एक आध्यात्मिक दृष्टि से देखने की बात भी कही गई है।
हम कहते हैं—
“मेरी श्वास चल रही है।”
लेकिन वास्तव में श्वास अपने आप चल रही है।
हमने उसे शुरू नहीं किया।
हम सो रहे हों, तब भी श्वास चलती रहती है।
यहीं से समर्पण की भावना आती है।
यह देखने लगता है कि शरीर भी अपने आप चल रहा है, श्वास भी अपने आप चल रही है और बहुत कुछ अपने आप घट रहा है।
श्वास को हनुमान की तरह देखना
वीडियो में श्वास को हनुमान से जोड़ा गया है।
जो वर्तमान में गति हो रही है, जो प्राण चल रहा है, उसे हनुमान के रूप में देखने की बात कही गई है।
इस दृष्टि से अपनी श्वास को केवल “मेरी श्वास” न मानकर यह महसूस करना है कि यह उसी शक्ति की गति है।
जैसे हनुमान राम के आदेश से चलते हैं, वैसे ही यह प्राण भी उसी परम सत्ता की गति के रूप में देखा गया है।
इसलिए श्वास को देखते समय यह भाव रखा जा सकता है कि—
“यह मेरी नहीं, उसी की गति है।”
श्वास और वर्तमान
वीडियो में बार-बार वर्तमान में आने की बात कही गई है।
हम विचारों में उलझे रहते हैं कि कल क्या होगा, क्या मिलेगा या क्या बदलना चाहिए। लेकिन श्वास हमेशा इसी क्षण में चल रही है।
इसलिए जब हम अपनी श्वास को महसूस करते हैं तो हमारा ध्यान वर्तमान के स्पंदन पर आता है।
यही कारण है कि श्वास को ध्यान का माध्यम बनाया गया है।
श्वास और राम-जप
श्वास के साथ राम के नाम को भी जोड़ा जा सकता है।
वीडियो में कहा गया है कि जब राम-जप करें तो केवल शब्द पर ध्यान न हो, बल्कि उस नाद और स्पंदन को महसूस करें जो वर्तमान में चल रहा है।
राम केवल किसी को बुलाने का नाम नहीं है।
वर्तमान में जो स्पंदन चल रहा है, उसी को राम के रूप में महसूस करना है।
इसलिए श्वास चल रही है तो उसे भी उसी वर्तमान के नाद के रूप में देखना है।
श्वास से मौन की ओर
जब श्वास धीमी होती है तो मन भी धीरे-धीरे शांत होने लगता है।
फिर humming या राम-जप के माध्यम से उस नाद पर ध्यान लगाया जा सकता है।
राम का जप करें—
राम… राम…
फिर थोड़ा रुकें।
उस मौन को महसूस करें।
फिर राम।
इस तरह श्वास, नाद, जप और मौन एक ही साधना में जुड़ जाते हैं।
निष्कर्ष
वीडियो की इस साधना का सार यही है कि मन को स्थिर करने के लिए श्वास को धीमा और स्थिर करना है, फिर उस स्थिरता में नाद और राम-जप के माध्यम से वर्तमान के स्पंदन को महसूस करना है।
श्वास अपने आप चल रही है।
प्राण अपने आप चल रहा है।
और जब यह दिखाई देने लगता है कि “मैं नहीं कर रहा, यह हो रहा है,” तब समर्पण की शुरुआत होती है।
यही श्वास को साधना बनाने का रहस्य बताया गया है।