हम अक्सर कहते हैं—“मैं रोज़ जप करता हूँ”, “मैं ध्यान करता हूँ”, “मैं यह कर रहा हूँ।”
लेकिन भक्ति में धीरे-धीरे यह भाव आता है कि मैं नहीं कर रहा, वो करवा रहा है।
गुरु नानक कहते हैं—“अनबोलत मेरी बिरथा जानी, अपना नाम जपायो।”
मतलब, मैंने कुछ कहा भी नहीं और उसने मेरी पीड़ा जान ली और अपना नाम जपवा दिया।
इसलिए यह अहंकार भी नहीं होना चाहिए कि “मैं रोज़ जप करता हूँ।”
जप भी वही करवा रहा है।
श्वास भी अपने आप चल रही है। शरीर भी अपने आप चल रहा है। भोजन भी अपने आप पच रहा है।
जहाँ यह दिखाई देने लगता है कि “मैं कर रहा हूँ” वाली बात ही गलत है, वहीं समर्पण का भाव आता है।
बस इतना समझना है—वो ही करवा रहा है।