योगी की सात प्रकार की प्रज्ञा या प्रज्ञा की सात भूमिया

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के साधन पाद (सूत्र 2.27) में योगी की सात प्रकार की प्रज्ञा या प्रज्ञा की सात भूमियों का वर्णन किया है—“तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा”।

इन्हीं 7 अवस्थाओं को दो मुख्य भागों में बाँटा जाता है: कार्यविमुक्ति (पहले 4 चरण) और चित्तविमुक्ति (अंतिम 3 चरण)।

आपकी इमेज में दी गई बुद्धि की सात अवस्थाएँ और उनका पतंजलि योगसूत्र के अनुसार वास्तविक अर्थ:

  • 1. हेय शून्य अवस्था (Realisation of what to avoid)
    • शास्त्रीय अर्थ: ‘हेय’ यानी दुख या संसार का स्वरूप जान लेना। साधक को यह स्पष्ट बोध हो जाता है कि जानने योग्य दुख क्या हैं और अब कुछ भी ऐसा नहीं बचा जिसे दुखरूप समझकर त्यागा न गया हो।
  • 2. हेय हेतु शून्य अवस्था (Realisation of how to avoid)
    • शास्त्रीय अर्थ: ‘हेय हेतु’ यानी दुख के कारण (अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश) को पहचानकर नष्ट कर देना। साधक समझ लेता है कि दुख का कारण क्षीण हो चुका है और अब कुछ भी नष्ट करना बाकी नहीं है।
  • 3. प्राप्य-प्राप्त अवस्था / हान-प्राप्ति (Holding on to Right Knowledge / Realisation of Goal)
    • शास्त्रीय अर्थ: ‘हान’ यानी कैवल्य (मुक्ति) की स्थिति को प्राप्त कर लेना। जो प्राप्त करने योग्य था (विवेकख्याति/सत्य ज्ञान), वह प्राप्त हो चुका है। अब पाने के लिए कुछ शेष नहीं बचा।
  • 4. चिकीर्षा शून्य अवस्था / कार्य-शून्यता (Intellect turns into Wisdom / End of Actions)
    • शास्त्रीय अर्थ: ‘चिकीर्षा’ का अर्थ है कुछ करने की इच्छा। इस अवस्था में बुद्धि के सभी कर्तव्य पूरे हो जाते हैं। साधक के लिए अब कोई भी कर्म या साधना करना शेष नहीं रहता (कृतकृत्यता)।
  • 5. चित्त सत्य कृतार्थता / चित्त-विमुक्ति (Awareness of non-authority of worldly plane)
    • शास्त्रीय अर्थ: चित्त का अपना अधिकार समाप्त हो जाता है। चित्त समझ लेता है कि पुरुष (आत्मा) के लिए उसका जो भोग और अपवर्ग (मुक्ति) का कार्य था, वह पूरा हो गया है।
  • 6. गुण लीनता (Experience of everlasting virtues / Dissolution of Gunas)
    • शास्त्रीय अर्थ: तीनों गुण (सत्त्व, रजस्, तमस्) अपने मूल कारण (प्रकृति) में विलीन होने लगते हैं। बुद्धि और चित्त का त्रिगुणात्मक प्रभाव हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है।
  • 7. आत्मस्थिति / स्वरूप-प्रतिष्ठा (Experience of GODness within / Self-Realization)
    • शास्त्रीय अर्थ: ‘तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्’ — पुरुष (आत्मा) अपने विशुद्ध स्वरूप में स्थित हो जाता है। बुद्धि और प्रकृति से परे जाकर केवल आत्मा ही अपने निज स्वरूप में भासित होती है।

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